1. क्रिसमस
जिस प्रकार हिंदू लोग भगवान कृष्ण के जन्म दिवस पर उत्सव मना कर खुश होते हैं। उसी प्रकार ईसाई लोग ईसा मसीह का जन्मोत्सव मनाकर प्रसन्न होते हैं। ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को हुआ था। इसलिए इसाई लोग प्रतिवर्ष इसी दिन उत्सव मनाते हैं।
यह ईसाइयों का त्योहार क्रिसमस कहलाता है। इसे बड़ा दिन भी कहते हैं। इस दिन इसाई लोग गिरजा घर जाते हैं और मोमबत्ती जलाकर अपना हर्ष प्रकट करते हैं। वह आपस में मिलते हैं तथा मिठाइयाँ और केक खिलाते हैं। बहुत से लोग अपने मित्रों और संबंधियों को शुभकामनाएं भेजते हैं ।
वह इस दिन हरे, लाल, पीले गुब्बारों और खिलौने से क्रिसमस ट्री (वृक्ष) सजाते हैं। यह ईसाइयों के आनंद और उल्लास का दिन होता है।
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2.क्रिसमस
[मुख्य बिंदु: भूमिका, जन्म-कथा, आयोजन, महत्ता, महत्ता, उपसंहार]
जिस प्रकार दशहरा-दीपावली का संबंध पुरुषोत्तम श्रीराम से है और जन्माष्टमी का श्रीकृष्ण से उसी प्रकार क्रिसमस का संबंध ईश्वर-पुत्र ईसा मसीह इसे है। जब-जब इस संसार में आततायियों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा को पार कर जाता है, तब तक जग के पालनहार इस धरा पर अवतरित होते हैं और मानव को दानों की धानोता से मुक्त कराते हैं ईसा मसीह का "इस धरा पर इसी निमित्त हुआ। उन्होंने अपने समकालीन समाज को प्रेम और सेवा का पाठ पढ़ा कर संपूर्ण मानव जाति को मानवता के शाश्वत सत्य से साक्षात्कार कराया। मानव को पाप मुक्त कराने हेतु इन्होंने ईश्वर को सूली पर चढ़ा कर प्राणों की आहुति दी।
ईसा मसीह की जन्मतिथि को लेकर कुछ भ्रांतियाँ हैं, लेकिन 25 दिसंबर को इनके जन्म दिवस के रूप में क्रिसमस का महापर्व सारे संसार में धूमधाम से मनाया जाता है।
इनका जन्म यहूदी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम यूसुफ और माता का नाम मरियम था। उन दिनों रोम में राजा या राज कर्मचारी द्वारा यहूदियों पर तरह-तरह के अमानुषिक अत्याचार किए जाते थे। राजा के दंड के कारण इनके माता-पिता को अपने पुश्तैनी मकान बेथलहम जाना पड़ा। मुसीबत इनके साथ साए की तरह चल रही थी। फलत: वहाँ किसी भी सराय में सर छिपाने को जगह न मिली। पति-पत्नी को हारकर एक पहाड़ी गुफा में शरण लेनी पड़ी। वहीं उसी रात प्रभु ईसा मसीह का जन्म हुआ।
क्रिसमस के दिन प्रत्येक ईसाई गिरजाघर में जाकर विशेष रूप से आयोजित प्रार्थना में सम्मिलित होते हैं और पादरी के मुख से निकले पवित्र उपदेशों को आत्मसात् करते हैं। लोगों का हृदय करुणा-प्रेम और सेवा-भाव से भर जाता है। इस अवसर पर विशेष रूप से तैयार किया गया 'क्रिसमस ट्री (वृक्ष)' रंगीन बल्बों की रोशनी से जगमगा उठता है। जब सांताक्लाॅज द्वारा बच्चों को मनभावन उपहार भेंट किए जाते हैं, तब उनकी खुशियां परवान चढ जाती है। हर तरफ आनंद और उत्साह का समा बँध जाता है।
मनुष्य पाप-कर्म के कारण ईश्वर से अलग हो गया है। ईसामसीह मनुष्य-जाति को पाप से मुक्त कराने आए थे। उनके उपदेशों का सार था - "सभी से प्रेम करो, दूसरों की भलाई करो, अपाहिजों की सेवा करो।"
प्रभु ईसा का संपूर्ण जीवन गरीब, लाचार, बीमार व्यक्तियों की सेवा में समर्पित रहा। उन्होंने मानवता की खातिर अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए। हमें उनके महान आदर्शों -प्रेम, बलिदान, नि:स्वार्थ, सेवा-भाव और त्याग से प्रेरणा लेनी चाहिए।
3.क्रिसमस डे
क्रिसमस ईसाइयों का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह प्रत्येक वर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है। इसी तिथि को ईसाई धर्म के प्रवर्तक महात्मा ईसामसीह का जन्म हुआ था। अतः इसे ईसामसीह के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार को संसार के सभी इसाई सोल्लास मनाते हैं।
रोम के क्रूर शासकों ने ईसा मसीह को 'क्रॉस (सलीब)' पर लटका दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। क्रॉस पर लटकाने के कारण ईसामसीह को 'क्राइस्ट' कहा गया और 'क्राइस्ट' के जन्मदिवस को 'क्रिसमस'।
25 दिसंबर से दिन बड़ा होने लगता है। इसलिए इसे 'एक्समस' भी कहते हैं।
'क्रिसमस' के त्योहार को ईसाई समुदाय बहुत धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन वे नए वस्त्र धारण करते हैं और पुराने वस्त्रों को त्याग देते हैं। वे केक काटते हैं और लोगों को अपने घर बुलाकर खिलाते हैं।
क्रिसमस के दिन गिरजाघर पूरा सज जाता है। मोमबत्तियों और बल्बों से गिरजाघरों की दीवारें जगमग करती हैं। गिरजाघर में एक पेड़ बनाया जाता है जिसे क्रिसमस ट्री (वृक्ष) कहते हैं। क्रिसमस ट्री को खिलौनों, गेंदों, सितारों और बिजली के बल्बों से सजा दिया जाता है। उस दिन गिरजाघर में विशेष चहल पहल रहती है। ठीक रात के बारह बजे जोर-जोर से घंटे बजने लगते हैं। ड्रम की धमाकेदार आवाज सुनाई देती है। छुटती हुई फुलझरियों की चमक दिखाई देती है। पटाखों का शोर धूम मचाता रहता है। रात के समय बारह बजे ही ईसामसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसामसीह के अनुयाई रात के बारह बजे अपनी प्रसन्नता को अभिव्यक्त करते हैं।
इस दिन गिरजा घरों में विशेष प्रार्थनाएं होती हैं। धर्म गुरु उपदेश देते हैं। पादरी पवित्र जल छिड़क कर लोगों को आशीर्वाद देते हैं।
क्रिसमस के त्योहार मनाने में जहाँ खुशी प्रदर्शित की जाती है, वहीं ईसामसीह के उपदेशों के पालन करने का संकल्प भी लिया जाता है। सभी प्राणियों से प्रेम करने की भावना को भी जगाया जाता है। ईसाई लोग सरल, क्षमाशील, विनम्र और उदार बनने का संकल्प लेते हैं।
4.क्रिसमस-ईसामसीह का जन्मदिन
भारत में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। इनमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध आदि प्रमुख हैं। धर्मनिरपेक्षता के कारण भारत में सभी तरह के पर्व मनाए जाते हैं। क्रिसमस अर्थात बड़े दिन का त्यौहार ईसाई जाति के धर्मों का महान पर्व है। यह पर्व हिंदुओं के रामनवमी तथा जन्माष्टमी पर्व से मिलता-जुलता है। क्रिसमस का त्यौहार लगभग विश्व के सभी देशों में मनाया जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है। इस दिन ईसाई धर्म के संस्थापक ईसामसीह का जन्म हुआ था। उसी खुशी में यह त्यौहार मनाया जाता है। भूगोल की दृष्टि से यह दिन वर्ष भर का सबसे बड़ा दिन होता है। इसलिए इसे बड़ा दिन भी कहते हैं।
इस दिन की ईसाई लोगों द्वारा बड़ी उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा की जाती है। इस संसार में महा प्रभु ईसामसीह के जन्मदिन को बड़ी पवित्रता और आस्थापूर्वक मनाया जाता है। इस दिन ही श्रद्धालु और विश्वस्त भक्तजन ईसामसीह के पुनर्जन्म की शुभकामना किया करते हैं। उनकी याद में विभिन्न स्थानों पर प्रार्थनाएं और मूल भावनाएं प्रस्तुत की जाती हैं।
क्रिसमस का त्यौहार मुख्य रूप से ईसाई धर्म के अनुयायियों और उसके समर्थकों द्वारा मनाया जाता है। ईसामसीह का जन्म 25 दिसंबर की रात 12:00 बजे बेथलेहम शहर में स्थित एक गौशाला में हुआ था। उनकी माँ का नाम मरियम था। जो कि दाऊद वंश की थीं। उनकी माँ ने उन्हें एक साधारण कपड़े में लपेटकर धरती पर लिटा दिया था। जन्म के समय ईसामसीह का नाम इमानुएल रखा गया। इस शब्द से अभिप्राय मुक्ति प्रदान करने वाले से है। इनके नाम के अनुरूप ही कहा जाता है कि ईश्वर ने उन्हें इस धरती पर मुक्ति प्रदान करने वाले के रूप में अपना दूत बनाकर भेजा था, जिसे ईसामसीह ने अपने कार्यों द्वारा सिद्ध भी कर दिखाया।
पर्व से एक दिन पूर्व (पहले) अर्थात 24 दिसंबर से लोग अपने घरों के साथ-साथ धार्मिक स्थलों को भी सजाने लग जाते हैं। इस दिन ठीक अर्धरात्रि में ईसामसीह का जन्म हुआ था। इस खुशी में लोग अपने घरों को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाते हैं। ठीक रात्रि 12:00 बजे गिरजा घरों में प्रार्थना शुरू हो जाती है। और शुरू हो जाता है बड़े दिन का यह त्यौहार। रात्रि 1:00 बजे से 25 दिसंबर का बड़ा दिन शुरू हो जाता है। इस दिन भी गिरजा घरों में प्रार्थना की जाती है। प्रार्थना सभा समाप्त होने पर वहाँ उपस्थित लोग एक दूसरे को बधाई देकर अपने-अपने घर लौट जाते हैं।
यह त्यौहार विश्व का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। ईसाई धर्म की विशालता के कारण इस संप्रदाय के लोग लगभग विश्व के हर हिस्से में रहते हैं। इसलिए यह त्यौहार संपूर्ण विश्व में बड़े ही लगन और तत्परता के साथ प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
ईसामसीह सत्य, अहिंसा और मानवता के संस्थापक और प्रतीक कहलाते हैं। इनके सामान्य और साधारण जीवन के आचरण को देखकर कहा जा सकता है कि वे सादा जीवन और उच्च विचार के प्रतीकात्मक महामना थे। ईसामसीह ने भेड़-बकरियों को चराने हुए उस समय प्रचलित अंधविश्वासों और रूढ़ियों के प्रति विरोध जताना शुरू किया, जिसका लोगों ने कड़ा विरोध किया। हालांकि उनके समर्थक भी थे जो कि अंधविश्वासों और रूढ़ियों को प्रगति में बाधक मानते थे।
उनके विरोधी ज्यादा होने के कारण उन्हें प्रसिद्धि मिलने में समय नहीं लगा। ईसामसीह के विचारों को सुन यहूदी लोग घबरा उठे। यहूदी अज्ञानी होने के साथ-साथ अत्याचारी भी थे। वह ईसामसीह को मूर्ख कह जलते भी थे लेकिन अंदर से वे ईसा मसीह से भयभीत थे। उन्होंने ईसा मसीह का विरोध करना शुरू कर दिया। यहूदियों ने ईसामसीह को जान से मार डालने तक की योजना बनानी शुरू कर दी थी। ईसामसीह को जब पता चला कि यहूदी उन्हें मारना चाहते हैं तो वे यहूदियों से कहा करते थे कि तुम मुझे आज मारोगे मैं कल फिर जी उठूंगा।
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