छठ पूजा
या
छठ की सुहावनी छटा
या
सूर्य पूजन
प्रतिवर्ष कार्तिक माह में छठ व्रत मनाया जाता है। चैत माह में भी छठ व्रत मनाया जाता है। चैत में गर्मी पड़ती है। इस कारण बहुत कम लोग चैत में छठ व्रत करते हैं। कार्तिक माह में प्रकृति कुछ आर्द हो जाती है। शरद ऋतु का आरंभ (आगमन) हो जाता है। निर्जल उपवास में छठव्रतियों को थोड़ी शीतलता मिलती है। इसलिए कार्तिक माह में छठव्रतियों की संख्या अधिक रहती है।
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छठ व्रत का बहुत महात्म्य है। यह बहुत पवित्रता से, नियमपूर्वक तथा पूर्ण अनुष्ठान के साथ मनाया जाता है। छठव्रती नियम-धर्म में थोड़ी सी भी चूक नहीं करते हैं । वे विधिपूर्वक तथा पवित्रतापूर्वक भगवान सूर्य की पूजा करते हैं। इसके लिए वे कठोर साधना भी करते हैं।
इस व्रत का आरंभ 'नहाए-खाए' से हो जाता है। इस दिन अरवा चावल, कद्दू की तरकारी और चने की दाल बनती है। दूसरे दिन 'खरना' होता है। इस दिन रात में खीर और रोटी से पूजा होती है तथा खीर और रोटी को प्रसाद के रूप में खिलाया जाता है।
तीसरे दिन छठव्रती संध्या समय भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए गंगा या नदी किनारे जाते हैं। इस समय का दृश्य बड़ा ही मनोहारी दिखता है। चारों ओर से छठव्रतियों, उनके संबंधियों तथा दर्शक जनों की भीड़ उमड़ती हुई दिखती है। लोगों के आने का ताँता लगा रहता है। प्रथम अर्घ्य देखने वाले दर्शकों की लंबी कतार दिख पड़ती है। इस प्रकार एक मेला जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है।
सिर पर पीले वस्त्र में दौरा लिए लोग घाट किनारे आते हैं। व्रतियों के पीछे महिलाएं पुरुष और बच्चे झुंड के रूप में चलते रहते हैं। रास्ते में औरतें समवेती स्वर में छठ व्रत के गीत गाती जाती हैं। उनके छठ के गीतों की गूंज से पूरा वातावरण छठमय हो जाता है। कुछ लोग ढोलक और माँदल बजवाते हुए घाट किनारे चलते जाते हैं।
संध्या के समय डूबते सूर्य की लालिमा को छठव्रती प्रथम अर्घ्य देते हैं। इस दृश्य को भक्तिभाव से देखने वालों की लंबी भीड़ दिखाई पड़ती है। धरती पर रंग बिरंगे सज्जित परिधानों से तथा सूर्य के लाल रंग से धरती और आकाश रंगीन दिखने लगते हैं। रंग-बिरंगी छटा से छठ की छटा और सुहावनी हो जाती है। प्रथम वर्ग की संध्या का सौंदर्य अपूर्व हो जाता है।
दूसरे दिन सूर्योदय के समय उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठव्रत का समापन किया जाता है। इसके बाद प्रसाद वितरण होता है। प्रसाद वितरण और प्रसाद ग्रहण का कार्य दो-तीन दिनों तक चलता रहता है। उत्तर भारत में यह पर्व का बहुत महत्व है। सभी व्रतों में छठ व्रत अति पवित्र व्रत है। इसी से व्रतों में इस व्रत को ऊँचा स्थान प्राप्त है।
