डॉ. भीमराव अंबेडकर पर निबंध / Doctor bheemrav Ambedkar per nibandh

1.डॉक्टर भीमराव अंबेडकर



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  परिचय, जन्म, शिक्षा, नौकरी-पेशा, योगदान और उपसंहार। ]

  बेमिसाल, भारत का लाल! दलितों का मसीहा, महान् विधिवेत्ता एवं संविधान-निर्माता बाबा अंबेडकर ऐसे युगपुरुष हैं, जिन्होंने जीन-संकीर्ण (आजीवन) सामाजिक कुप्रथाओं पर कुठाराघात कर हमें मानवता का पाठ पढ़ाया।

  इस दलित-उद्धारक का जन्म मध्यप्रदेश स्थित महू सैनिक छावनी में 14 अप्रैल, 1981 को हुआ था। इनका पूरा नाम 'बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर' था। इनके पिता का नाम रावजी एवं माता का नाम भीमा बाई था।

   ये बचपन से ही बहुत होनहार थे, प्रत्येक परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते थे। फलत:, बड़ौदा के महाराज ने 1913 ईस्वी में इन्हें एम• ए• करने हेतु कोलंबिया विश्वविद्यालय भेजा। वहाँ भी ये प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। वहाँ से यह विलायत पी• एच• डी• करने गए और सफल होकर वापस आए।

   ये भारत जब लौटे, तब महाराज ने इन्हें सैन्य-सचिव बनाया। इस प्रकांड विद्वान् के लिए यह पद उचित न था, अतः कुछ वर्षों के बाद, ये मुंबई आ गए और वहीं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए। लेकिन, ईश्वर की इच्छा कुछ और थी; इनके कर-कमलों से सर्वोच्च विधि-ग्रंथ लिखा जाना था, अतः ये मुंबई हाईकोर्ट में वकालत के पेशे से जुड़ गए। इस क्षेत्र में भी इन्होंने काफी नाम कमाया। कुछ वर्षों बाद जब भारत 1947 ई• में स्वतंत्र हुआ, तब ये विधि-मंत्री बनाए गए।

   भारत की शासन-व्यवस्था के लिए एक संविधान की आवश्यकता थी। विधि-ज्ञान में इनका कोई विकल्प न था, अतः इन्हें 'संविधान प्रारूप समिति' का अध्यक्ष बनाया गया। अपनी कुशाग्रबुद्धि, मेहनत और लगन के कारण, इन्होंने विशाल 'भारतीय संविधान' को मात्र 2 वर्ष 11 महीने और 18 दिनों में ही पूरा कर देशवासियों को विस्मित कर दिया। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए, इन्होंने मिलिन्द विश्वविद्यालय की स्थापना की; कई पुस्तकों की रचना भी की जिनमें 'बौद्ध धर्म एण्ड हिज धाम', 'स्मॉल होल्डिंग्स', 'कास्ट इन इंडिया' आदि प्रमुख हैं।

   प्रत्येक क्षेत्र में अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वाह करते हुए, इन्होंने स्पृश्यता और दलितों पर हो रहे अत्याचार का मुखर विरोध किया। फलत: ऐसे अत्याचारियों की कुबुद्धि, सद्बुद्धि की राह पर लौटने लगी। लेकिन, हजारों वर्षों से चली आ रही इस घिनौनी कुप्रथा का पूर्ण अंत आसान न था, अतः इन्होंने हारकर 1955 ई• में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। अपनी मानसिक पीड़ा और क्लेश को ये झेल न सके और 1956 ईस्वी में स्वर्ग सिधार गए। देश और समाज को जो कुछ उन्होंने दिया। उसे देखते हुए कहा जा सकता है:

वाह रे ! गुदड़ी का लाल,

तूने कर दिया कमाल।

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