Path 16 amrit wani Class 5 Hindi Pathbahar West Bengal Board, कक्षा 5 हिंदी पाठ 16 अमृत वाणी पश्चिम बंगाल बोर्ड

कक्षा 5 हिन्दी पाठबहार (NOTES) पश्चिम बंगाल बोर्ड

पाठ  16
अमृत वाणी

कबीर
जीवन-परिचय - कबीरदास भक्तिकाल के निर्गुण काव्यधारा के अंतर्गत ज्ञानमार्गी शाखा के कवि थे। उनका जन्म संवत् 1455 को काशी में एक विधवा बाह्मणी के गर्भ से हुआ था। ये नीरू और नीमा नामक जुलाहे के घर पले थे। इनका विवाह लोई नामक खी से हुआ था। कवीरदास की रूचि बचपन से ही भगवत-भजन की ओर थी। ये रामानन्द को अपना गुरु बनाना चाहते थे। किन्तु उन्होंने मुसलमान होने के कारण इन्हें अपना गुरु बनाने से मना कर दिया। अंत में कबीरदास रात्रि को गंगाघाट की सौड़ियों पर जाकर लेट गये। प्रातः काल के समय जब गंगाघाट पर रामानंद स्नान करने के लिए आए तो अंधेरे में उनका पैर कवीरदास की छाती पर पड़ा और उनके मुख से 'राम-राम' निकला। इसी को कबीर ने गुरुमंत्र मानकर रामानंद जी को अपना गुरु मान लिया। कबीरदास पढ़े-लिखे नहीं थे, परन्तु उनमें अ‌द्भुत काव्य प्रतिभा थी। उनके शिष्यों ने उनकी कविताएँ लिखी और उनका संग्रह किया। कवीर की प्रमुख रचना 'बीजक', है। बीजक के तीन भाग किए गये है साखी सब्द और रमैनी। कवीरदास जाति-पाति, ऊँच-नीच, छुआछूत, तीर्थ-व्रत आदि के कट्टर विरोधी थे। वे अपनी आत्मा की आवाज के अनुसार कार्य करते थे। उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों, साधु-संन्यासी सभी को समान रूप से फटकारा। संवत् 1575 को मगहर में इनका निधन हो गया।
बोली एक अमोल है, जो कोउ बोले जानि। 
हिये तराजू तौलि कै, तब मुख बाहर आनि ।।
शब्दार्थ : अमोल = मूल्यवान; हिए = हृदय; तराजू = तौल करने की वस्तुः तौलिकै = तौलकर (यहाँ उचित अनुचित का विचार कर)।

अर्थः कबीरदास जी कहते हैं कि बोली बहुत मूल्यवान वस्तु है यदि कोई समझ बूझ कर बोले तो। अतः हृदय रूपी तराजू पर तौल कर अर्थात् बहुत सोच विचार कर ही कुछ बोलना चाहिए।

काल्ह करै सो आज कर, आज करे सो अब। 
पल में परलै होयगी, बहुरि करैगो कब ।।
शब्दार्थ : काल्ह = कल; परलै = प्रलय, विनाश, मृत्युः बहुरि = फिर, पुनः ।

अर्थ :  कबीरदास जी कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज ही करना चाहिए, और जो आज करना है उसे अभी कर लेना चाहिए। मृत्यु का कोई ठिकाना नहीं कब आ जाय। पल भर में ही यदि मृत्यु हो जायेगी तो फिर कब करोगे। कहने का सारांश है कि ईश्वर भजन में आजकल का विचार न करके तुरन्त लग जाना चाहिए।

करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान। 
रसरी आवत-जात तै, सिल पर परत निसान।।

शब्दार्थ : करत-करत = लगातार काम में लगे रहना; जड़मति मूर्खः सुजान = ज्ञानी; रसरी = रस्सी ।

अर्थ : कबीरदास जी कहते हैं कि लगातार अभ्यास करके मूर्ख व्यक्ति भी ज्ञानी बन सकता है। जिस प्रकार कोमल रस्सी के बार-बार एक ही जगह पर रगड़ खाने से पत्थर जैसे कठोर वस्तु पर भी निशान बन जाता है। (class 5 hindi Solution WBBE) 

तुलसीदास

जीवन-परिचय - तुलसीदास - गोस्वामी तुलसीदास रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनका जन्म राजापुर में संवत् 1554 में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। उनका विवाह दीनबन्धु पाठक की पुत्री रत्नावली के साथ हुआ। रत्नावली के फटकार से उन्होंने वैराग्य ग्रहण किया। गोस्वामी जी ने अयोध्या आकर 'रामचरितमानस' लिखना प्रारंभ किया। अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने काशी में बिताया। गोस्वामी तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाओं में 'रामलला नहछू', 'जानकी मंगल', 'रामचरितमानस', 'गीतावली', 'विनयपत्रिका', 'कवितावली', आदि प्रमुख ग्रंथ हैं। संवत् 1680 में उनका स्वर्गवास हो गया। तुलसीदास भक्त, समाज सुधारक, लोकनायक थे। उन्होंने शाखसम्मत भक्ति का लोक जीवन के साथ मेल कर उसे सरल और सुलभ बनाया। उन्होंने ऊँच-नीच, अकिनारीव आदि सबमें रामत्व की स्थापना की। गोस्वामी जी ने समाज, साहित्य, संस्कृति आदि का कोई कोना नहीं छोड़ा। भाषा शैली की दृष्टि से देखा जाए तो उन्होंने अवधी और बज दोनों भाषाओं का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। उन्होंने अनेक छंद-दोहा, चौपाई, सोरठा आदि का प्रयोग किया है। उनकी भाषा सर्ल, सरस, सजीव, सुगठित एवं मार्मिक है। तुलसीदास की विद्धता को देखकर प्रियर्सन ने उन्हें बुद्धदेव के बाद का सबसे बड़ा लोकनायक कहा था।


का बरषा जब कृषी सुखाने । 
समय चूकि पुनि का पछिताने ।।
शब्दार्थ : बरखा = वर्षा, चूकि = बीत जाने, पछिताने = पश्चाताप करने।

अर्थ :  तुलसीदास जी कहते हैं कि समय से अपना काम कर लेना चाहिए। जैसे फसल के सूख जाने पर वर्षा का कोई लाभ नहीं होता, उसी प्रकार निर्धारित समय बीत जाने पर पश्चाताप करना व्यर्थ होता है। 


पर उपदेस कुसल बहुतेरे । 
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।।

शब्दार्थ : पर = दूसरे को; बहुतेरे = मनुष्यः घनेरे = कई। बहुत से; आचरहि = आचरण करने वाले, नर = मनुष्य; घनेरे = कई

अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं कि दूसरों को उपदेश देना सरल है। अतः उपदेश देने वाले अनेक लोग होते हैं। पर स्वयं उस तरह का आचरण करना कठिन है, अतः आचरण करने वाले लोग कम मिलते हैं।


परहित सरिस धरम नहिं भाई। 
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।

शब्दार्थ : परहित = परोपकार; सरिस = समान; अधमाई = नीच काम, बुरा कार्य। 
अर्थ :  तुलसीदास जी कहते हैं कि परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं है, और दूसरे को कष्ट देने से बड़ा कोई बुरा कार्य नहीं है।


रहीम

 जीवन-परिचय - रहीम - मध्यकालीन सामंतवादी संस्कृति के कवि रहीम का मूल नाम अब्दुर्ररहीम खानखाना था। उनका जन्म संवत् 1613 में लाहौर में हुआ था। रहीम की शिक्षा समाप्त होने के बाद लगभग 16 वर्ष की उम्र में अकबर ने उनका विवाह मिर्जा अजीज कोका की बहन माहवानी से करवा दिया था। रहीम कलम और तलवार के धनी थे। उन्हें अकबर से मिर्जा खाँ की उपाधि भी मिली थी। रहीम एक ऐसे कवि थे जिन्होंने हिंदू जीवन को भारतीय जीवन का यथार्थ मानते हुए अपने काव्य में रामायण, महाभारत, पुराण और गीता जैसे ग्रंथों के कथानको को उदाहरणस्वरूप चुना। रहीम के ग्रंथों में रहीम दोहावली, नायिका भेद, शृंगार, सोरठा, राग पंचाध्यायी, फुटकर छंद आदि प्रसिद्ध हैं। उन्होने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में ही कविता की है जो सरल, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है। उनके काव्य में श्रृंगार, शांत एवं हास्य रस मिलते हैं।

  वस्तुतः कहा जा सकता है कि रहीम ने अपनी काव्य रचना द्वारा हिन्दी साहित्य की जो सेवा की उसकी मिसाल विरले ही मिलेगी।

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करै किन कोय। 
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय ।।
शब्दार्थ : बिगरी बात = मुंह से निकली हुयी खराब बात; माखन = मक्खन; मधे = मथने पर। 
अर्थ : कवि रहीमदास जी कहते हैं कि एक बार मुंह से निकली कठोर या खराब बात लाख उपाय करने पर भी ठीक नहीं हो सकती, जैसे लाख प्रयास के बाद भी फटे दूध से मक्खन नहीं बन सकता है।
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखौ गोय। 
सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहें कोय ।।
शब्दार्थ : निज = अपना; व्यथा = कष्ट; गोय = गोपनीय, छिपाकर; सुनि = सुनकर; अठिलैहें = खुश होंगे; बॉटि = बांटना; लैहें = लेंगे।
अर्थ : कवि रहीमदास जी कहते हैं कि हमें अपने मन के कष्ट को मन में ही छिपाकर रखना चाहिए, किसी से कहना नहीं चाहिए क्योंकि इस कहे हुए कष्ट को कोई कम नहीं करेगा, अपितु इसके बारे में में जानकर खुश होगा और हँसी उड़ायेगा।

बड़े बड़ाई न करे, बड़े न बोले बोल। 
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मो मोल ।।
शब्दार्थ : मोल = मूल्य; लाख टका मो मोल = मेरा मूल्य लाख रुपए, अत्यधिक मूल्यवान।

अर्थ : कवि रहीमदास जी कहते हैं कि जो लोग सही माने में बड़े महान अर्थात् होते हैं वे अपनी बड़ाई स्वयं नहीं करते तथा बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते जैसे हीरा मूल्यवान होते हुए भी कभी नहीं कहता कि मेरा मूल्य लाखों रुपया है।

1. संक्षेप में उत्तर दो।

1.1 किसी से कैसे बोलना चाहिए?

उत्तर : किसी से बोलने के पहले उसे अपने हृदय रूपी तराजू में तौलकर अर्थात् सोच-सम कर बोलना चाहिए।

1.2 किसी काम को कल पर क्यों नहीं टालना चाहिए।

उत्तर : मनुष्य का जीवन क्षण मंगुर है। उसकी मृत्यु कभी भी हो सकती है। अतः किसी काम को कल पर नहीं टालना चाहिए।

1.3 अभ्यास करने का क्या लाभ है?

उत्तर : लगातार अभ्यास करके मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान हो जाता है।

1.4 वर्षा के बहुत ज्यादा या कम होने से क्या-क्या नुकसान होता है?

उत्तर : वर्षा के बहुत अधिक या कम होने से कृषि नष्ट हो जाती है। 

1.5 दूसरों को उपदेश क्यों नहीं देना चाहिए?

उत्तर : जब तक अपने आचरण में परिवर्तन न लाया जाय दूसरे को उपदेश देने से कोई फायदा नहीं होता अतः दूसरों को उपदेश नहीं देना चाहिए।

1.6 दूसरे की पीड़ा को किसकी पीड़ा समझनी चाहिए?

उत्तर : दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझनी चाहिए।

1.7 हमारा सच्चा मित्र या शुभचिंतक कौन है? इसका पता कब चलता है?

उत्तर : हमारा सच्चा मित्र या शुभ चितक वही होता है जो हमारे कष्टों को कम करता है।

1.8 बिगड़ी बात क्या बन पाती है?

उत्तर  : नहीं, बिगड़ी बात कभी नहीं बन पाती है।

1.9 मन की व्यथा को मन में ही क्यों छिपाए रखना चाहिए?

उत्तर : हमें अपने मन की व्यथा को मन में ही रखना चाहिए क्योंकि कोई सुनकर व्यथा को कम

नहीं करेगा, अपितु हमारी हंसी उड़ायेगा।

1.10 हमें अपनी बड़ाई क्यों नहीं करनी चाहिए?

उत्तर : हमे अपनी बड़ाई स्वयं नहीं करनी चाहिए क्योकि हीरा मूल्यवान होने पर भी अपना मोल नहीं करता और चुप रहता है।

1.11 किसे सबसे अच्छा कार्य कहा गया है?

उत्तर : परोपकार को सबसे अच्छा काम कहा गया है।

2. निम्नलिखित पंक्तियों के भाव स्पष्ट करो।

2.1 हिये तराजू तौलि कै, तब मुख बाहर आनि।

उत्तर : उपर्युक्त पंक्ति का अर्थ यह है कि बिना विचार किए हुए कोई भी बात तुरन्त नहीं कहनी चाहिए। कोई बात कहने के पूर्व उसके लाभ-हानि, उचित-अनुचित के बारे में सोच विचार कर लेना चाहिए।

2.2 परहित सरसि धरम नहि भाई?

उत्तर : परोपकार अर्थात दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है।

2.3 सुनि अतिलैहै लोग सब बॉटि न लैहें कोय।।

उत्तर : अपना कष्ट किसी से कहने पर लोग उसकी खिल्ली उड़ायेंगे हमारे कष्ट को बाँट नहीं लेंगे।

3. क्या हानि होगी-

3.1 दूसरों से कठोर बात कहने पर।

उत्तर : वह व्यक्ति नाराज होगा और विरोध बढ़ेगा।

3.2 आज का काम कल पर टालने पर।

उत्तर : काम कभी पूरा नहीं होगा।

3.3 मन की व्यथा हर एक से कहने पर।

उत्तर : अपना कष्ट कम नहीं होगा, अपितु दूसरे मजाक उड़ायेगें।

3.4 अपनी बड़ाई अपने आप करने पर।

उत्तर : अपनी इज्जत कम होती है।

3.5 समय को खोने पर।

उत्तर : पछताना पड़ता है।

4. उन्हें कौन सा दोहा सुनाकर समझाएंगे - जब

4.1 तुम्हारे वे मित्र जो पढ़ाई-लिखाई में पीछे पड़ने के कारण दुखी हो जाते हैं।

उत्तर : का वरषा जब कृषि सुखाने, समय चूकि पुनि का पछिताने।

4.2 तुम्हारे वे मित्र जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हों।

उत्तर : परहित सरिस धर्म नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।

4.3 तुम्हारे वे मित्र जो अपनी बड़ाई खुद करते हैं।

उत्तर : रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मो मोल।

5. निम्नलिखित शब्दों के समान अर्थ वाले शब्द लिखो। 

बरसा = वर्षा, सरसि = समान, रसरी = रस्सी, अधमाई = नीच कार्य, जड़मत = मूर्ख, पुनि = फिर, माखन = मक्खन, मुख = मुंह

6. इन दोहों से मिलने वाली शिक्षाओं की एक सूची बनाओ।

उत्तर : (1) बहुत सोच समझ कर बोलना चाहिए।

(2) काम कभी कल पर नहीं टालना चाहिए।

(3) अभ्यास से कठिन काम सरल हो जाता है।

(4) समय बीत जाने पर पछताना बेकार है।

(5) दूसरे को उपदेश नहीं देना चाहिए।

(6) परोपकार सबसे बड़ा धर्म है।

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